Wednesday, 12 August 2026

LIBRARIAN DAY 12TH AUGUST

 LIBRARIAN DAY 12TH AUGUST 

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भारत में हर साल 12 अगस्त को 'राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस' (National Librarian's Day) मनाया जाता है। यह दिन भारत में पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एस. आर. रंगनाथन (Dr. S. R. Ranganathan) की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिनका जन्म 12 अगस्त 1892 को हुआ था

डॉ. एस. आर. रंगनाथन के बारे में मुख्य बातें

पूरा नाम: शिआली रामामृत रंगनाथन (Shiyali Ramamrita Ranganathan) .

योगदान: उन्होंने भारत में पुस्तकालय विज्ञान को नई दिशा दी और 'कोलन वर्गीकरण' (Colon Classification) तथा 'फाइव लॉस ऑफ लाइब्रेरी साइंस' (Five Laws of Library Science) प्रतिपादित किए। [1, 2, 3, 4]

रंगनाथन का जन्म 12 अगस्त 1892 (उनके डॉक्यूमेंट के अनुसार) को शियाली, मद्रास वर्तमान चेन्नई में हुआ था। रंगनाथ की शिक्षा शियाली के हिन्दू हाई स्कूल, मद्रास क्रिश्चयन कॉलेज में (जहां उन्होने 1913 और 1916 में गणित में बी ए और एम ए की उपाधि प्राप्त की) और टीचर्स कॉलेज, सईदापेट्ट में हुयी। 1917 में वे गोवर्नमेंट कॉलेज, मंगलोर में नियुक्त किए गए। बाद में उन्होने 1920 में गोवर्नमेंट कॉलेज, कोयंबटूर और 1921-23 के दौरान प्रेजिडेंसी कॉलेज, मद्रास विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। 1924 में उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय का पहला पुस्तकालयाध्यक्ष बनाया गया और इस पद की योग्यता हासिल करने के लिए वे यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड गए। परन्तु मन नही लगने पर वे वापस लौट आए 1925 से मद्रास में उन्होने यह काम पूरी लगन से शुरू किया और 1944 तक वे इस पद पर बने रहे। 1945-47 के दौरान उन्होने बनारस (वर्तमान वाराणसी) हिन्दू विश्वविद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष और पुस्तकालय विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया व 1947-54 के दौरान उन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया। 1954-57 के दौरान वे ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड में शोध और लेखन में व्यस्त रहे। इसके बाद वे भारत लौट आए और 1959 तक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में अतिथि प्राध्यापक रहे। 1962 में उन्होने बंगलोर में प्रलेखन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया और इसके प्रमुख बने और जीवनपर्यंत इससे जुड़े रहे। 1965 में भारत सरकार ने उन्हें पुस्तकालय विज्ञान में राष्ट्रीय शोध प्राध्यापक की उपाधि से सम्मानित किया।[1][2]

योगदान और निर्णायक कथन

  • इनकी फ़ाईव लौज ऑफ लाइब्रेरी साइंस (1931) को पुस्तकालय सेवा के आदर्श और निर्णायक कथन के रूप में व्यापक रूप से स्वीकृत किया गया है, इसके अतिरिक्त -
  • क्लासिफाईड कैटेलॉग कोड (1934)
  • प्रोलेगोमेना टु लाइब्रेरी क्लासिफिकेशन (1937)
  • थ्योरी ऑफ लाइब्रेरी कैटेलॉग (1938)
  • एलीमेंट्स ऑफ लाइब्रेरी क्लासिफिकेशन (1945)
  • क्लासिफिकेशन एंड इन्टरनेशनल डाक्यूमेंटेशन (1948)
  • क्लासिफिकेशन एंड कम्यूनिकेशन (1951)
  • हेडिंग्स एंड काइनन्स (1955) प्रमुख हैं।[3]

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